यह सपनो की दुनिया ख्वाबों में तो जन्नत लगती है,
पर किनारे बैठ कर दरिया की गहराई का पता किसे चलता है।
काफी छोटी है यह दुनिया जिसे जीतने के लिए हम न जाने कितनी बड़ी लड़ाइयां लड़ लेते है, कभी लोगो से तो कभी खुद से ही।
जीत तुम्हारा इंतजार कर रही है हर रोज खुद से यह कहना पड़ता है और वक्त बदल देने का इरादा लेकर इस वक्त की मार को भी सहना पड़ता है।
ख्वाबों का एक इम्तेहान है जिसे जिंदगी के पन्नो पे काली सिहायी से लिखना है, परिणाम कुछ भी हो गहरा छप ही जाता है।
खैर गिरना भी जरूरी है, अगर गिरते नहीं तो जिंदगी दूसरा मौका कहां देती, गिरकर उठना उठकर गिरना, यही सिलसिला चलता रहता है।
हर शाम में उम्मीद होती है
हर सुबह में जुनून
हम टूटे है, थके नहीं
बिखरे है, मरे नहीं !
© अनिकेतकोहली
