रास्ते काफी बदले से है,
आसरे भी अब टूटे से है,
वो मीठे बोल अब सुनाई नही देते,
मेरे फोन की घंटियां अब उसका नाम नही लेती।

पर जाने क्यों इक तालाश सी है,
टूटी ही सही पर जिंदा एक आस सी है,
कुछ ख़ुद में खोये है, कुछ तुम में
तुम्हारे लफ्ज़ कानों में आज भी गूंजते है।

हां टूटे है हम और तुम्हारे चुप ज़वाब,
पिरोये तो तुमने भी थे कई झूठे ख़्वाब,
सिफ़र है सफ़र मेरा, तुम्हारे बाद
ठहरा मैं मुंतजिर और तुम गुमशुदा।

अधूरे है हम, अधूरा लगे सब
इंतज़ार था वस्ल का पर मिले बस अश्क,
दुआएं भी न सुनी क्यों तूने ऐ ख़ुदा,
क्यूं मैं मुंतजिर, वो क्यूं गुमशुदा।

©अनिकेतकोहली